भगवद गीता अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग): ईश्वर का विराट स्वरूप, काल-तत्त्व और परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव

भगवद गीता अध्याय 11 (विश्वरूप दर्शन योग): ईश्वर का विराट स्वरूप, काल-तत्त्व और परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव

क्या आपने कभी ब्रह्मांड के परम रहस्य को एक ही पल में अनुभव करने की कल्पना की है? क्या आप उस क्षण की कल्पना कर सकते हैं जब अनंत, सर्वशक्तिमान ईश्वर आपके सामने अपने पूर्ण, विराट स्वरूप में प्रकट हो जाए? यह कोई कपोल-कल्पना नहीं, बल्कि भगवद गीता के अध्याय 11 का सार है, जिसे ‘विश्वरूप दर्शन योग’ के नाम से जाना जाता है। 

यह अध्याय न केवल भगवद गीता का सबसे अद्भुत और चमत्कारी प्रसंग है, बल्कि यह मानव चेतना को ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव की चरम सीमा तक ले जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्रदान कर अपना विराट (विश्वरूप) स्वरूप दिखाते हैं, जिसमें संपूर्ण सृष्टि, देवता, काल, जन्म–मृत्यु, सृजन–संहार एक साथ प्रकट होते हैं। इस लेख में, हम भगवद गीता अध्याय 11, विश्वरूप दर्शन योग हिंदी में इसकी गहराइयों में गोता लगाएंगे, कृष्ण का विराट रूप कैसे प्रकट हुआ, भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है, और ‘काल मैं हूँ’ जैसे गूढ़ अर्थों को समझेंगे। यह अध्याय ईश्वर को केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष, रोमांचक और भयभीत करने वाले अनुभव के रूप में प्रस्तुत करता है, जो मानव अहंकार, भय, भक्ति तथा समर्पण की चरम अवस्था को उजागर करता है।

Key Takeaways:

  • विश्वरूप दर्शन: अर्जुन को श्रीकृष्ण का अलौकिक, सर्वव्यापी, और अनंत स्वरूप देखने का अवसर मिला, जिसमें संपूर्ण सृष्टि समाहित थी।

  • काल-तत्त्व का अनावरण: भगवान ने स्वयं को ‘काल’ (महाकाल) के रूप में प्रकट किया, जो सृजन, पालन और संहार का नियंत्रक है, यह समझाते हुए कि ‘काल मैं हूँ’ और यह जीवन और मृत्यु का सत्य है।

  • अहंकार का नाश और समर्पण: विराट स्वरूप का अनुभव अर्जुन के अहंकार को तोड़ता है, उसे अपनी तुच्छता का बोध कराता है, और उसे भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की ओर अग्रसर करता है।

  • भय और भक्ति का अनूठा संबंध: अर्जुन पहले भयभीत होता है, फिर विस्मय और अंततः प्रेमपूर्ण भक्ति की ओर बढ़ता है, जो दिव्य अनुभव की जटिलता को दर्शाता है।

  • परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव: यह अध्याय ईश्वर को केवल एक अवधारणा नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष, जीवंत और सर्वव्यापक सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसका अनुभव ‘दिव्य दृष्टि’ से ही संभव है।

विश्वरूप दर्शन: भगवान का वास्तविक स्वरूप और कृष्ण का विराट रूप

A warrior kneels before a many-armed, radiant deity surrounded by cosmic elements, with text about Bhagavad Gita Chapter 11 and the universal form of Lord Krishna.

 

अर्जुन ने पिछले अध्यायों में श्रीकृष्ण को अपने मित्र, सारथी और परम गुरु के रूप में जाना था। विभूति योग, में श्रीकृष्ण ने अपनी विभिन्न विभूतियों का वर्णन किया था, यह बताते हुए कि वे किस प्रकार हर वस्तु में श्रेष्ठता के रूप में विद्यमान हैं। किंतु अर्जुन की अभिलाषा थी कि वह उस परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप को देखे जिसके बारे में श्रीकृष्ण ने बताया था।

अर्जुन चाहता था कि वह भगवान का वास्तविक स्वरूप अपनी आँखों से देखे, न कि केवल कल्पना करे। उसकी इस तीव्र इच्छा को पूर्ण करने के लिए, श्रीकृष्ण ने उसे अपनी ‘दिव्य दृष्टि’ प्रदान की।

एक सामान्य मानव आँख उस अनंत और विराट स्वरूप को सहन नहीं कर सकती। इसलिए, यह दृष्टि केवल एक शारीरिक बदलाव नहीं, बल्कि चेतना का एक गहरा उन्नयन था। जैसे ही अर्जुन को दिव्य दृष्टि मिली, उसके सामने एक ऐसा दृश्य प्रकट हुआ जिसे शब्दों में बयां करना असंभव है।

“अर्जुन! अब तू मेरे उन सैकड़ों-हजारों अलौकिक रूपों को देख, जो नाना प्रकार के और नाना वर्णों के हैं। तू मुझमें सारे देवताओं को, सभी भूत-समूहों को, ब्रह्मा को सिंहासन पर बैठे हुए, और सभी ऋषियों को देख। जो कुछ भी तू देखना चाहता है, वह सब एक ही जगह, मेरे इस शरीर में देख।”

— भगवद गीता अध्याय 11, श्लोक 5-7

इस श्लोक के साथ ही अर्जुन ने कृष्ण का विराट रूप देखा। यह स्वरूप इतना विशाल, इतना अद्भुत था कि उसमें:

  • अनंत मुख और नेत्र: हजारों मुख, हजारों नेत्र, हजारों भुजाएं, हजारों उदर – प्रत्येक दिशा में अनगिनत।

  • संपूर्ण सृष्टि का समावेश: देवता, असुर, मनुष्य, पशु, पक्षी, ग्रह, नक्षत्र, आकाशगंगाएं, पर्वत, नदियां, सभी एक ही शरीर में समाए हुए थे।

  • अद्भुत आभूषण और शस्त्र: दिव्य वस्त्र, दिव्य मालाएं, दिव्य सुगंध, अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र।

  • तेज और प्रकाश: करोड़ों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश होता है, वह भी उस विश्वरूप के तेज के सामने फीका पड़ जाता था।

  • शाश्वत और क्षणभंगुर: सृजन और संहार, जन्म और मृत्यु, अतीत, वर्तमान और भविष्य – सब एक साथ प्रकट हो रहे थे।

यह ईश्वर का विराट दर्शन सिर्फ एक भौतिक दृश्य नहीं था; यह परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव था। अर्जुन ने देखा कि कैसे सृष्टि का कण-कण उस परम सत्ता से ही उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। यह ऐसा था मानो वह ब्रह्मांड के सारे रहस्य एक साथ देख रहा हो, जैसे किसी ने ब्रह्मांड के पर्दे हटा दिए हों और उसे अनंत की झलक मिल गई हो। यह क्षण अर्जुन के लिए उसके जीवन का सबसे निर्णायक क्षण था, जहाँ उसके सारे संशय और भ्रम एक ही झटके में दूर हो गए।

यह अनुभव उसे भय और विस्मय के गहरे सागर में धकेल देता है, जहाँ तर्क और भावना दोनों एक साथ चरम पर पहुँच जाते हैं। अर्जुन विषाद योग, में अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए यह दर्शन अत्यंत आवश्यक था।

अर्जुन का विश्वरूप दर्शन: भय और विस्मय का अद्भुत मिश्रण

जब अर्जुन ने यह विराट स्वरूप देखा, तो वह हक्का-बक्का रह गया। उसका शरीर कांपने लगा, उसके रोंगटे खड़े हो गए। जिस कृष्ण को वह अपना सखा समझता था, वह अचानक ब्रह्मांड का स्वामी, काल का भी काल, महाकाल के रूप में प्रकट हो गया था। इस दर्शन ने अर्जुन के मन में एक साथ भय, विस्मय और भक्ति की गहरी भावनाएं जगा दीं।

“मुझे तुम्हारे इस भयानक रूप को देखकर भय हो रहा है। मैं दिशाओं को नहीं पहचान पा रहा हूँ, और मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है।”

— भगवद गीता अध्याय 11, श्लोक 24

अर्जुन ने देखा कि उस विराट स्वरूप के मुख में सभी योद्धा प्रवेश कर रहे हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में, और पतंगे अग्नि में। उसे अपने सामने युद्ध के मैदान में खड़े सभी प्रमुख योद्धा, जैसे भीष्म, द्रोण, कर्ण, और स्वयं धृतराष्ट्र के पुत्र भी, उस विराट मुख में जाते हुए दिखाई दिए, उनके सिर चूर्णित होते हुए। यह दृश्य उसे भीषण भविष्य की याद दिलाता है, जहाँ युद्ध का परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। यह उसे समझाता है कि जो कुछ भी हो रहा है, वह एक दैवी योजना का हिस्सा है, और श्रीकृष्ण सिर्फ एक सारथी नहीं, बल्कि उस योजना के सूत्रधार हैं।

यह दर्शन अर्जुन को उसकी अपनी सीमाओं का एहसास कराता है। वह समझता है कि उसका ज्ञान, उसकी शक्ति, और उसका अहंकार उस परम सत्ता के सामने कुछ भी नहीं है। यह अनुभव गीता से अहंकार नाश का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ व्यक्ति अपनी तुच्छता को स्वीकार कर परम सत्ता के प्रति समर्पण करता है। इस अनुभव के बाद, अर्जुन को केवल कृष्ण पर विश्वास ही नहीं, बल्कि एक पूर्ण श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न होती है।

काल-तत्त्व का अनावरण: काल मैं हूँ गीता अर्थ और जीवन-मृत्यु का सत्य

A diagram illustrates the cycle of life and death, showing birth, growth, decay, and death with a central depiction of Kaal (Time), quoting the Bhagavad Gita and emphasizing impermanence.

विश्वरूप दर्शन के दौरान, अर्जुन ने भगवान से पूछा कि वे कौन हैं, इस भयानक रूप में क्यों प्रकट हुए हैं। इसके जवाब में, श्रीकृष्ण ने एक ऐसा गूढ़ और शक्तिशाली सत्य उद्घाटित किया, जो भगवद गीता के सबसे गहरे संदेशों में से एक है:

“कालः अस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।”

— भगवद गीता अध्याय 11, श्लोक 32

इसका अर्थ है: “काल मैं हूँ जो लोकों का विनाश करने वाला हूँ, और यहाँ इन लोकों का संहार करने के लिए ही आया हूँ।”

यह श्लोक काल मैं हूँ गीता अर्थ को स्पष्ट करता है, जहाँ भगवान स्वयं को ‘महाकाल’ के रूप में प्रकट करते हैं। यहाँ ‘काल’ केवल समय का मापक नहीं है, बल्कि वह सर्वोच्च शक्ति है जो सृष्टि का सृजन करती है, पालन करती है, और अंततः उसका संहार भी करती है। यह इस बात पर जोर देता है कि हर चीज का एक निश्चित जीवनचक्र होता है, और अंततः सब कुछ उसी परम शक्ति में विलीन हो जाता है जिससे वह उत्पन्न हुआ है।

यह सत्य जीवन और मृत्यु का सत्य गीता के केंद्रीय विचारों में से एक है। अर्जुन युद्ध करने से हिचक रहा था क्योंकि उसे अपने रिश्तेदारों को मारना था। लेकिन ‘काल’ के इस दर्शन ने उसे समझाया कि ये सभी योद्धा पहले से ही ‘काल’ द्वारा मारे जा चुके हैं। श्रीकृष्ण ने कहा कि अर्जुन तो केवल एक निमित्त मात्र है। यह एक महत्वपूर्ण सबक है कि हम सभी अपने जीवन में केवल अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, जबकि परिणाम और योजनाएँ उस परम शक्ति के हाथों में होती हैं।

इस संदर्भ में, भगवद गीता अध्याय 11 सरल व्याख्या यह है कि जीवन और मृत्यु के चक्र को भगवान ही नियंत्रित करते हैं। हमारा जीवन एक नाटक के समान है, जहाँ हम अपनी भूमिका निभाते हैं, और जब हमारा समय आता है, तो हम इस मंच से विदा हो जाते हैं। इस समझ से भय मुक्त होने और कर्तव्यनिष्ठा के साथ अपने कर्मों को करने की प्रेरणा मिलती है।

दैवी योजना: भगवान सर्वत्र कैसे हैं?

‘काल’ के इस अनावरण के माध्यम से, भगवद गीता अध्याय 11 यह भी स्पष्ट करता है कि भगवान सर्वत्र कैसे हैं। यदि भगवान ही काल हैं, और काल सब कुछ का संहारक और सृजक है, तो इसका अर्थ है कि भगवान हर जगह, हर समय और हर घटना में मौजूद हैं।

  • उत्पत्ति और विलय: भगवान ही हर वस्तु की उत्पत्ति का कारण हैं और वही उसके अंत का भी।

  • नियंत्रण और व्यवस्था: ब्रह्मांड में जो कुछ भी हो रहा है, वह एक दैवी योजना के तहत हो रहा है। युद्ध, शांति, जन्म, मृत्यु, सुख, दुख – सब कुछ उस परम सत्ता की इच्छा से संचालित होता है।

  • चेतना और जड़ता: चेतना से लेकर जड़ पदार्थ तक, सभी भगवान की ही अभिव्यक्ति हैं। जैसे कि कर्म संन्यास योग, में निष्काम कर्म की बात की गई है, यह दर्शाता है कि हमारा कर्म भी उसी दैवी योजना का हिस्सा है।

यह दर्शन व्यक्ति को ‘मैं’ और ‘मेरा’ के संकीर्ण दायरे से बाहर निकालकर एक वृहद दृष्टिकोण प्रदान करता है। जब अर्जुन ने देखा कि उसके सामने के सभी योद्धा पहले से ही भगवान के मुख में समा रहे हैं, तो उसे समझ आया कि युद्ध का परिणाम पहले से ही निश्चित है। उसे बस अपना कर्तव्य निभाना है। यह समझ हमें दैनिक जीवन में भी शांति और स्वीकृति प्रदान कर सकती है, यह जानते हुए कि कुछ चीजें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं और एक बड़ी योजना के तहत काम कर रही हैं। 

यह हमें ‘शरणगति’ की ओर ले जाता है, जैसा कि भगवद् गीता का सर्वोच्च ज्ञान और भक्ति का परम मार्ग, में बताया गया है।

परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव और भक्ति का सर्वोच्च मार्ग

A three-panel illustration showing a person moving from fear and devotion, to surrendering ego, to experiencing peace and bliss in union with a radiant divine figure.

भगवद गीता अध्याय 11 का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह ईश्वर को केवल एक दार्शनिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में प्रस्तुत करता है। अर्जुन ने केवल भगवान के बारे में सुना नहीं, बल्कि उसे देखा, अनुभव किया, और उससे भयभीत भी हुआ। यह अनुभव इतना तीव्र था कि वह उसे सहन नहीं कर सका और उसने श्रीकृष्ण से अपने सौम्य, चतुर्भुज रूप में वापस आने की प्रार्थना की।

“हे सहस्त्रबाहु! मैं तुम्हें उस रूप में देखना चाहता हूँ जिसमें तुम शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हुए हो। हे विश्वमूर्ते! हे विश्वेश्वर! तुम अपने उसी चतुर्भुज रूप को धारण करो।”

— भगवद गीता अध्याय 11, श्लोक 46

यह दर्शाता है कि दिव्य अनुभव कितना भी अद्भुत क्यों न हो, मानव मन और इंद्रियाँ उसकी प्रचंडता को लंबे समय तक सहन नहीं कर सकतीं। हमें ईश्वर के उस रूप की आवश्यकता होती है जिससे हम प्रेम कर सकें, जिससे संबंध बना सकें, जो सुलभ हो।

भय और भक्ति का संबंध: एक अनोखी यात्रा

विश्वरूप दर्शन अर्जुन के लिए भय और भक्ति का एक अनूठा संगम था। पहले वह भयभीत हुआ, फिर विस्मित, और अंततः प्रेमपूर्ण भक्ति से भर गया। यह भय और भक्ति का संबंध दर्शाता है कि कैसे भय भी कभी-कभी हमें सच्चाई के करीब ला सकता है, हमारी सीमाओं का एहसास करा सकता है, और हमें उस परम शक्ति के सामने विनम्र बना सकता है। जब हम अपनी तुच्छता को पहचानते हैं, तभी हम वास्तविक अर्थों में समर्पण कर पाते हैं।

अर्जुन के इस अनुभव से हम सीखते हैं कि ईश्वर का अनुभव हमेशा सुखद या शांत नहीं होता। यह भयानक, विस्मयकारी और चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है। लेकिन इसी चुनौती में आत्मिक विकास का मार्ग छिपा होता है। जब अर्जुन ने विराट स्वरूप से वापस श्रीकृष्ण के सौम्य रूप को देखा, तो उसके मन में प्रेम और शांति की गहरी भावना उमड़ पड़ी। यह दर्शाता है कि भगवान के प्रति भक्ति हमें किसी भी भय से मुक्त कर सकती है और हमें परम शांति प्रदान कर सकती है। 

जैसा कि भक्ति योग के महत्व को समझाया गया है, यह अध्याय भक्ति के सर्वोच्च मार्ग को दर्शाता है।

गीता से अहंकार नाश और आत्मविकास का मार्ग

विश्वरूप दर्शन योग व्यक्ति के अहंकार को तोड़ने का एक शक्तिशाली माध्यम है। जब हम ब्रह्मांड की विशालता और उसमें अपनी नगण्यता को समझते हैं, तो हमारा अहंकार स्वतः ही विलीन होने लगता है। अर्जुन का अहंकार, कि वह एक महान योद्धा है, या वह अपने निर्णय स्वयं ले सकता है, इस दर्शन के बाद पूरी तरह से भंग हो गया। उसे समझ आया कि वह केवल एक उपकरण है उस परम शक्ति के हाथों में।

यह गीता से अहंकार नाश का सीधा मार्ग है। जब अहंकार नष्ट होता है, तभी सच्ची विनम्रता और समर्पण का जन्म होता है। यह विनम्रता ही हमें आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाती है और हमें परम शांति प्राप्त करने में मदद करती है।

इस अध्याय की गीता अध्याय 11 पूर्ण अर्थ और गीता अध्याय 11 सरल व्याख्या यही है कि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और अविनाशी है। वह न केवल सृजनकर्ता है, बल्कि संहारकर्ता भी है। हम मनुष्यों को अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए, अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, और उस परम सत्ता के प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम रखना चाहिए। यह ज्ञान हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने, मृत्यु के भय से मुक्त होने, और एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की शक्ति प्रदान करता है।

उदाहरण के लिए, एक युवा पेशेवर जो 2026 में अपने करियर में ऊंचाइयों को छूने की कोशिश कर रहा है, उसे लग सकता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है। लेकिन जब वह इस अध्याय के गूढ़ रहस्यों को समझता है – कि ‘काल मैं हूँ’ और सब कुछ एक दैवी योजना के तहत है – तो वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करेगा, लेकिन परिणामों को ईश्वर पर छोड़ देगा। यह उसे अनावश्यक तनाव और चिंता से मुक्ति दिलाएगा।

गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग भी इस अध्याय से बहुत कुछ सीख सकते हैं। परिवार के सदस्य, रिश्ते, धन-संपत्ति – सब कुछ क्षणभंगुर है। इस सत्य को समझने से हम रिश्तों में प्रेम और कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, लेकिन आसक्ति से बचते हैं। यह हमें मानसिक शांति प्रदान करता है और हमें जीवन के सच्चे अर्थ को समझने में मदद करता है।

निष्कर्ष: विश्वरूप दर्शन योग का चिरस्थायी प्रभाव

भगवद गीता का अध्याय 11, ‘विश्वरूप दर्शन योग’, सनातन धर्म के सबसे शक्तिशाली और रहस्यमय अध्यायों में से एक है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि परम सत्य का एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अनुभव है, जो सदियों से साधकों को प्रेरित करता रहा है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर केवल एक अवधारणा या दूर की शक्ति नहीं है, बल्कि वह सर्वत्र, हर कण में, हर क्षण में विद्यमान है। ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव संभव है, यद्यपि इसके लिए ‘दिव्य दृष्टि’ और एक खुले, समर्पित मन की आवश्यकता होती है।

2026 में भी, जब दुनिया तेजी से बदल रही है और हम अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं, यह अध्याय हमें स्थिरता और शांति प्रदान करता है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही हम अपने जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं में उलझे हों, एक विशाल ब्रह्मांडीय नृत्य चल रहा है, जिसका निर्देशन स्वयं भगवान कर रहे हैं। जीवन और मृत्यु का सत्य गीता में इतनी स्पष्टता से वर्णित है कि यह हमें भयमुक्त होकर जीने की प्रेरणा देता है।

भगवद गीता अध्याय 11 से हम सीखते हैं:

  • अपनी सीमाओं को पहचानो।

  • ईश्वर की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमानता को स्वीकार करो।

  • भय से परे जाकर प्रेम और भक्ति में स्थित हो जाओ।

  • अपने अहंकार का त्याग करो और स्वयं को दैवी योजना का एक हिस्सा मानो।

  • कर्म करो, लेकिन फल की आसक्ति त्यागो, क्योंकि ‘काल मैं हूँ’ और सब कुछ उसी परम सत्ता के नियंत्रण में है।

यह अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि गीता का सबसे अद्भुत अध्याय क्यों है। यह हमें केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि अनुभव कराता है। यह हमें केवल सिद्धांतों से अवगत नहीं कराता, बल्कि उन्हें जीवंत कर देता है।

इसलिए, यदि आप आध्यात्मिक पथ पर गंभीर हैं, मानसिक शांति की तलाश में हैं, या बस जीवन के गहरे अर्थों को समझना चाहते हैं, तो भगवद गीता अध्याय 11 का बार-बार अध्ययन करें। इसे पढ़ें, इस पर मनन करें, और इसके संदेशों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। यह निश्चित रूप से आपको आत्मिक विकास के एक नए आयाम पर ले जाएगा और आपको परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करने में मदद करेगा। 

अधिक ज्ञान और आत्मविकास के लिए, ज्योतिष देव जैसे स्रोत एक उत्कृष्ट संदर्भ प्रदान करते हैं।

 

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